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अध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया। इस देश के वर्तमान भारी संकट के समय में और विशेष रूप से उस समय जबकि हम लड़ाई से अभी निवृत्त हुए हैं और आकाश में लड़ाई के बादल दूसरी तरफ से आने शुरू हुए हैं, हमारे वित्तमंत्री ने जो बजट पेश किया है, वे इसके लिए बधाई के पात्र हैं। यद्यपि भिन्न-भिन्न पहलुओं को लेकर आलोचनाएं की गई हैं, लेकिन यदि उनकी कठिनाइयों को भी देखा होता कि राष्ट्र को किन-किन संकटों का सामना करना पड़ रहा है, इस बात पर भी अगर मेरे से पहले बोलने वाले वक्ताओं ने विचार किया होता तो मेरा विश्वास है कि उनकी आलोचनाओं का आधार कुछ दूसरा होता। उन्होंने ऐसे कठिन अवसर पर यह एक संतुलित बजट पेश किया है, उसके लिए मैं उन्हें बार-बार बधाई देता हूं, लेकिन साथ ही साथ मैं अपना यह कर्तव्य समझता हूं कि कुछ ऐसे विचार भी उनके सामने प्रस्तुत करूं, जिससे उनकी कठिनाइयां कुछ हल हो जाएं। उदाहरण के रूप में विगत दो वर्षों में लेखा-जोखा कमेटी में बैठने के समय मुझे ऐसा अनुभव हुआ है कि इस देश में दो-तीन इस प्रकार की त्रुटियां मौजूद हैं, जिनको दूर करने के लिए जिनकी जांच करने के लिए यदि कोई एक कमेटी या आयोग बिठा दिया जाए तो राष्ट्र की रक्षा व्यवस्था के लिए करोड़ों नहीं अरबों की व्यवस्था फौरन हो सकती है। केवल शासन को जागरूक होकर कुछ कदम उठाने की आवश्यकता है। अभी कुछ छिपे हुए धन का जिक्र किया गया। सरकार ने भी समय-समय पर ऐसा आभास दिया है कि इस देश में लगभग 30,000 करोड़ रुपए का छिपा धन मौजूद है। स्वयं मैं समझ नहीं पाता हूं कि जब सरकार ऐसा अनुभव करती है तो इसकी व्यवस्था करने में उसको दिक्कत क्या आ रही है। ऐसा मालूम होता है कि कहीं इच्छाशक्ति की कमी है। भारत की इस सरकार ने अपनी शक्ति का ठीक से उपयोग करके उस दुश्मन के दांत खट्टे किए, जिसके कि ऊपर विश्व की शक्तिशाली और इंग्लैंड जैसी शक्तियों का अटूट सहारा था और जिसको कि उन्होंने हमारे विरुद्ध उकसा कर खड़ा किया था और अपना पूर्ण सहयोग दिया था। अध्यक्ष महोदय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की मांगों के संबंध में बोलने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं। शिक्षा की पद्धति के बारे में, उसमें परिवर्तन लाने के बारे में, इस क्षेत्र में हमें जो असफलता हाथ लगी है, उसके बारे में अभी मेरे मित्र ने बहुत कुछ कहा है। दुर्भाग्य की बात यह है कि देश में सभी लोग यह मानते हैं कि शिक्षा में प्रगति नहीं हुई है, शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन नहीं हुए हैं, लेकिन फिर भी इस दिशा में कुछ किया नहीं जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस विषय में कुछ भी करने की स्थिति में हम नहीं रहे हैं। स्थिति ज्यों की त्यों चली आ रही है। इतना होने पर भी शिक्षा की मद पर होने वाला जो खर्च है और जो उसके लिए धनराशि आबंटित की गई है, वह भी बहुत थोड़ी है, लेकिन उस पर न जाकर मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की वाली कहावत ही आज चरितार्थ हो रही है। जितने ज्यादा आयोग और समितियां बैठीं और जितनी ज्यादा शिक्षा पद्धति के बारे में छानबीन की गई, उतनी ही ज्यादा बीमारी बढ़ती गई, बीमारी का इलाज न होकर और भी खराबियां पैदा होती गईं। अभी मेरे मित्र ने माननीय मंत्री का ध्यान एक रिपोर्ट की तरफ दिलाया था। इस तरह की बहुत-सी रिपोर्टें हैं। अभी सदस्य महोदय भी एक रिपोर्ट का जिक्र कर रहे थे। रिपोर्ट तो बहुत-सी प्रस्तुत हुई हैं, लेकिन मंत्रालय ने उस पर कभी कार्यान्वयन करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। अपनी इस हालत को उन्होंने इसी सदन में स्वयं स्वीकार किया है, अपनी विवशता को उन्होंने स्वयं यहां प्रकट किया है। इस विषय पर और अधिक न कहकर मैं आज के दिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय का ध्यान दो विशेष विषयों की तरफ दिलाना चाहता हूं। पहली बात तो मैं हिंदी के बारे में कहना चाहता हूं। मंत्रालय का काम हिंदी का प्रसार और प्रचार करना है। हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा है। संविधान ने उसको राष्ट्रभाषा का स्थान दिया है, लेकिन हिंदी को वह स्थान अभी तक भी ठीक से प्राप्त नहीं हुआ है, इसके कई कारण हो सकते हैं। एक कारण हिंदी प्रेमियों का अधिक उत्साह हो सकता है। दूसरा दलगत राजनीति से प्रभावित होकर राजनेताओं का भाषा के बारे में अपनाया गया दृष्टिकोण हो सकता है। महोदय, जो यह बजट प्रस्तुत हुआ है, वह देश का एक ऐसा नया चित्र उपस्थित करता है, जो चित्र उम्मीद का है, आशा का है, सफलता का है, इसमें नए कर ज्यादा नहीं लगाए गए हैं और जो थोड़े से कर लगाए भी गए हैं, वे इस ढंग से लगाए गए हैं कि सभी लोगों पर उसका बोझ पड़ता है, इससे भी उनको निराशा हुई है। दूसरी बात जिससे उनको निराशा हुई है यह है कि एक-दो वर्ष देश को लेनदेन के मामले में कठिनाई का सामना करना पड़ा था, योजना को कठिनाई में पड़ना पड़ा था, वह कठिनाई दूर हो गई है और मैं सदन की तरफ से उन देशों को धन्यवाद देना चाहता हूं, उन देशों के प्रति आभार प्रदर्शित करना चाहता हूं, जिन्होंने हमारी इस कठिनाई को दूर करने में आगे बढ़कर हाथ बटाया है। मेरे मित्रों को इससे निराशा हुई है कि विदेशी सहायता बहुत ज्यादा और तेजी से पहुंच रही है और जो हमारी कठिनाई दूर हो गई है, इससे उनको परेशानी हुई। कम्युनिस्ट इसलिए भी परेशान हैं कि पिछले एक-दो वर्षों में देश की पैदावार बहुमुखी ढंग से बढ़ी है। औद्योगिक पैदावार बढ़ी है, यह उनके लिए निराशा का कारण बना हुआ है। उनकी निराशा इसलिए भी बढ़ी है कि उनका मालिक, उनका मित्र, हमारे देश की सीमा पर जब फौज लेकर खड़ा है और जब देश पर खतरा है तो क्यों देश की आर्थिक हालत, क्यों देश की वित्तीय हालत तथा दूसरी हालत इतनी अच्छी हुई है और क्यों इतनी अच्छी छवि उभरी है, लेकिन उनकी निराशा हमारी सबसे बड़ी आशा है, उनकी असफलता हमारी सबसे बड़ी सफलता है और मैं समझता हूं कि उनके भाषण हमारे वित्तमंत्री महोदय के लिए सबसे बड़े बधाई के भाषण हैं। दो-तीन और चीजों की ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं, उनकी ओर दूसरे माननीय सदस्यों ने भी आपका ध्यान दिलाया है। हमारी सरकार का ध्यान भी उस ओर गया है, लेकिन मैं समझता हूं कि उन पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। पहली बात तो यह है कि जब चीजों की पैदावार बढ़ रही है, जब देश उन्नति की तरफ जा रहा है, तब भी देश में कीमतें बढ़ रही हैं। महोदय यह मानना है कि उनको रोका नहीं जा सकता, गलत है। इस महंगाई को रोकने के लिए कुछ विशेष कदम उठाने होंगे, कुछ विशेष काम करने होंगे। एक विशेष चीज जो इस बजट में आई है और जो घबराहट पैदा करने वाली है, यह है कि देश की पैदावार तो बढ़ रही है, देश का विकास तो हो रहा है, लेकिन इसके साथ ही साथ देश में बेकारी बढ़ रही है और खासतौर पर पढ़े-लिखे लोगों की बेकारी बढ़ रही है। लोगों का बेकार होना खतरनाक चीज है। हमारी स्वतंत्रता के बाद शायद यह पहला अवसर है, जब हमारी स्वतंत्रता के ऊपर एक आघात हुआ है और हम जिस प्रकार अपनी स्वतंत्रता की प्राप्ति के समय अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तैयार थे, उसी प्रकार इस समय भी हमें तैयार होना होगा। माननीय प्रधानमंत्री जी के मत से मैं सर्वथा सहमत हूं कि यह एक ऐसा अवसर है, जिस अवसर पर कि इस देश की प्रतिनिधि संस्था, जो यह लोकसभा है, उसे इस संबंध में अपनी स्पष्ट राय देनी है और उस राय को देने के बाद हमें उस राय के अनुसार सरकार जो भी कार्रवाई करे, उसमें सरकार को पूरा-पूरा सहयोग भी देना है। प्रजातंत्र में प्रजा के पूर्ण सहयोग के बिना काम नहीं चल सकता, चाहे वह कोई काम हो, छोटा काम हो या बड़ा काम हो। फिर यह तो हमारी स्वतंत्रता की रक्षा का प्रश्न है और ऐसे अवसर पर प्रजातंत्रवादी राष्ट्र को उसकी सारी प्रजा को सरकार के साथ सहयोग के लिए तैयार रहना चाहिए। मैंने यह बात कई बार कही है और मैं फिर से इसे दोहराना चाहता हूं कि अनेक ऐसी बातें हैं, जिनमें कि भिन्न-भिन्न राजनीतिक दलों के होते हुए भी सब राजनीतिक दल मिलजुलकर काम कर सकते हैं। यह एक ठीक इसी प्रकार का अवसर है। मैं अपने प्रधानमंत्री जी को वैदेशिक नीति का बड़ा भारी समर्थक रहा हूं और कल इस सदन में इस संबंध में जो बहस हुई, उससे भी यह पूरा परिणाम निकाला जा सकता है कि जहां तक हमारी वैदेशिक नीति के सिद्धांतों का संबंध है, वहां तक इस सदन का कोई दल, इस सदन का कोई भी सदस्य, उन सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं है। कल मैंने बड़े ध्यान से अपने साम्यवादी दल के नेता का भाषण सुना, उन्होंने यह कहा कि मूल प्रश्न हमारी मूल नीति के समर्थन का है।
अध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया। इस देश के वर्तमान भारी संकट के समय में और विशेष रूप से उस समय जबकि हम लड़ाई से अभी निवृत्त हुए हैं और आकाश में लड़ाई के बादल दूसरी तरफ से आने शुरू हुए हैं, हमारे वित्तमंत्री ने जो बजट पेश किया है, वे इसके लिए बधाई के पात्र हैं। यद्यपि भिन्न-भिन्न पहलुओं को लेकर आलोचनाएं की गई हैं, लेकिन यदि उनकी कठिनाइयों को भी देखा होता कि राष्ट्र को किन-किन संकटों का सामना करना पड़ रहा है, इस बात पर भी अगर मेरे से पहले बोलने वाले वक्ताओं ने विचार किया होता तो मेरा विश्वास है कि उनकी आलोचनाओं का आधार कुछ दूसरा होता। उन्होंने ऐसे कठिन अवसर पर यह एक संतुलित बजट पेश किया है, उसके लिए मैं उन्हें बार-बार बधाई देता हूं, लेकिन साथ ही साथ मैं अपना यह कर्तव्य समझता हूं कि कुछ ऐसे विचार भी उनके सामने प्रस्तुत करूं, जिससे उनकी कठिनाइयां कुछ हल हो जाएं। उदाहरण के रूप में विगत दो वर्षों में लेखा-जोखा कमेटी में बैठने के समय मुझे ऐसा अनुभव हुआ है कि इस देश में दो-तीन इस प्रकार की त्रुटियां मौजूद हैं, जिनको दूर करने के लिए जिनकी जांच करने के लिए यदि कोई एक कमेटी या आयोग बिठा दिया जाए तो राष्ट्र की रक्षा व्यवस्था के लिए करोड़ों नहीं अरबों की व्यवस्था फौरन हो सकती है। केवल शासन को जागरूक होकर कुछ कदम उठाने की आवश्यकता है। अभी कुछ छिपे हुए धन का जिक्र किया गया। सरकार ने भी समय-समय पर ऐसा आभास दिया है कि इस देश में लगभग 30,000 करोड़ रुपए का छिपा धन मौजूद है। स्वयं मैं समझ नहीं पाता हूं कि जब सरकार ऐसा अनुभव करती है तो इसकी व्यवस्था करने में उसको दिक्कत क्या आ रही है। ऐसा मालूम होता है कि कहीं इच्छाशक्ति की कमी है। भारत की इस सरकार ने अपनी शक्ति का ठीक से उपयोग करके उस दुश्मन के दांत खट्टे किए, जिसके कि ऊपर विश्व की शक्तिशाली और इंग्लैंड जैसी शक्तियों का अटूट सहारा था और जिसको कि उन्होंने हमारे विरुद्ध उकसा कर खड़ा किया था और अपना पूर्ण सहयोग दिया था। अध्यक्ष महोदय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की मांगों के संबंध में बोलने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं। शिक्षा की पद्धति के बारे में, उसमें परिवर्तन लाने के बारे में, इस क्षेत्र में हमें जो असफलता हाथ लगी है, उसके बारे में अभी मेरे मित्र ने बहुत कुछ कहा है। दुर्भाग्य की बात यह है कि देश में सभी लोग यह मानते हैं कि शिक्षा में प्रगति नहीं हुई है, शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन नहीं हुए हैं, लेकिन फिर भी इस दिशा में कुछ किया नहीं जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस विषय में कुछ भी करने की स्थिति में हम नहीं रहे हैं। स्थिति ज्यों की त्यों चली आ रही है। इतना होने पर भी शिक्षा की मद पर होने वाला जो खर्च है और जो उसके लिए धनराशि आबंटित की गई है, वह भी बहुत थोड़ी है, लेकिन उस पर न जाकर मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की वाली कहावत ही आज चरितार्थ हो रही है। जितने ज्यादा आयोग और समितियां बैठीं और जितनी ज्यादा शिक्षा पद्धति के बारे में छानबीन की गई, उतनी ही ज्यादा बीमारी बढ़ती गई, बीमारी का इलाज न होकर और भी खराबियां पैदा होती गईं। अभी मेरे मित्र ने माननीय मंत्री का ध्यान एक रिपोर्ट की तरफ दिलाया था। इस तरह की बहुत-सी रिपोर्टें हैं। अभी सदस्य महोदय भी एक रिपोर्ट का जिक्र कर रहे थे। रिपोर्ट तो बहुत-सी प्रस्तुत हुई हैं, लेकिन मंत्रालय ने उस पर कभी कार्यान्वयन करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। अपनी इस हालत को उन्होंने इसी सदन में स्वयं स्वीकार किया है, अपनी विवशता को उन्होंने स्वयं यहां प्रकट किया है। इस विषय पर और अधिक न कहकर मैं आज के दिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय का ध्यान दो विशेष विषयों की तरफ दिलाना चाहता हूं। पहली बात तो मैं हिंदी के बारे में कहना चाहता हूं। मंत्रालय का काम हिंदी का प्रसार और प्रचार करना है। हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा है। संविधान ने उसको राष्ट्रभाषा का स्थान दिया है, लेकिन हिंदी को वह स्थान अभी तक भी ठीक से प्राप्त नहीं हुआ है, इसके कई कारण हो सकते हैं। एक कारण हिंदी प्रेमियों का अधिक उत्साह हो सकता है। दूसरा दलगत राजनीति से प्रभावित होकर राजनेताओं का भाषा के बारे में अपनाया गया दृष्टिकोण हो सकता है। महोदय, जो यह बजट प्रस्तुत हुआ है, वह देश का एक ऐसा नया चित्र उपस्थित करता है, जो चित्र उम्मीद का है, आशा का है, सफलता का है, इसमें नए कर ज्यादा नहीं लगाए गए हैं और जो थोड़े से कर लगाए भी गए हैं, वे इस ढंग से लगाए गए हैं कि सभी लोगों पर उसका बोझ पड़ता है, इससे भी उनको निराशा हुई है। दूसरी बात जिससे उनको निराशा हुई है यह है कि एक-दो वर्ष देश को लेनदेन के मामले में कठिनाई का सामना करना पड़ा था, योजना को कठिनाई में पड़ना पड़ा था, वह कठिनाई दूर हो गई है और मैं सदन की तरफ से उन देशों को धन्यवाद देना चाहता हूं, उन देशों के प्रति आभार प्रदर्शित करना चाहता हूं, जिन्होंने हमारी इस कठिनाई को दूर करने में आगे बढ़कर हाथ बटाया है। मेरे मित्रों को इससे निराशा हुई है कि विदेशी सहायता बहुत ज्यादा और तेजी से पहुंच रही है और जो हमारी कठिनाई दूर हो गई है, इससे उनको परेशानी हुई। कम्युनिस्ट इसलिए भी परेशान हैं कि पिछले एक-दो वर्षों में देश की पैदावार बहुमुखी ढंग से बढ़ी है। औद्योगिक पैदावार बढ़ी है, यह उनके लिए निराशा का कारण बना हुआ है। उनकी निराशा इसलिए भी बढ़ी है कि उनका मालिक, उनका मित्र, हमारे देश की सीमा पर जब फौज लेकर खड़ा है और जब देश पर खतरा है तो क्यों देश की आर्थिक हालत, क्यों देश की वित्तीय हालत तथा दूसरी हालत इतनी अच्छी हुई है और क्यों इतनी अच्छी छवि उभरी है, लेकिन उनकी निराशा हमारी सबसे बड़ी आशा है, उनकी असफलता हमारी सबसे बड़ी सफलता है और मैं समझता हूं कि उनके भाषण हमारे वित्तमंत्री महोदय के लिए सबसे बड़े बधाई के भाषण हैं। दो-तीन और चीजों की ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं, उनकी ओर दूसरे माननीय सदस्यों ने भी आपका ध्यान दिलाया है। हमारी सरकार का ध्यान भी उस ओर गया है, लेकिन मैं समझता हूं कि उन पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। पहली बात तो यह है कि जब चीजों की पैदावार बढ़ रही है, जब देश उन्नति की तरफ जा रहा है, तब भी देश में कीमतें बढ़ रही हैं। महोदय यह मानना है कि उनको रोका नहीं जा सकता, गलत है। इस महंगाई को रोकने के लिए कुछ विशेष कदम उठाने होंगे, कुछ विशेष काम करने होंगे। एक विशेष चीज जो इस बजट में आई है और जो घबराहट पैदा करने वाली है, यह है कि देश की पैदावार तो बढ़ रही है, देश का विकास तो हो रहा है, लेकिन इसके साथ ही साथ देश में बेकारी बढ़ रही है और खासतौर पर पढ़े-लिखे लोगों की बेकारी बढ़ रही है। लोगों का बेकार होना खतरनाक चीज है। हमारी स्वतंत्रता के बाद शायद यह पहला अवसर है, जब हमारी स्वतंत्रता के ऊपर एक आघात हुआ है और हम जिस प्रकार अपनी स्वतंत्रता की प्राप्ति के समय अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तैयार थे, उसी प्रकार इस समय भी हमें तैयार होना होगा। माननीय प्रधानमंत्री जी के मत से मैं सर्वथा सहमत हूं कि यह एक ऐसा अवसर है, जिस अवसर पर कि इस देश की प्रतिनिधि संस्था, जो यह लोकसभा है, उसे इस संबंध में अपनी स्पष्ट राय देनी है और उस राय को देने के बाद हमें उस राय के अनुसार सरकार जो भी कार्रवाई करे, उसमें सरकार को पूरा-पूरा सहयोग भी देना है। प्रजातंत्र में प्रजा के पूर्ण सहयोग के बिना काम नहीं चल सकता, चाहे वह कोई काम हो, छोटा काम हो या बड़ा काम हो। फिर यह तो हमारी स्वतंत्रता की रक्षा का प्रश्न है और ऐसे अवसर पर प्रजातंत्रवादी राष्ट्र को उसकी सारी प्रजा को सरकार के साथ सहयोग के लिए तैयार रहना चाहिए। मैंने यह बात कई बार कही है और मैं फिर से इसे दोहराना चाहता हूं कि अनेक ऐसी बातें हैं, जिनमें कि भिन्न-भिन्न राजनीतिक दलों के होते हुए भी सब राजनीतिक दल मिलजुलकर काम कर सकते हैं। यह एक ठीक इसी प्रकार का अवसर है। मैं अपने प्रधानमंत्री जी को वैदेशिक नीति का बड़ा भारी समर्थक रहा हूं और कल इस सदन में इस संबंध में जो बहस हुई, उससे भी यह पूरा परिणाम निकाला जा सकता है कि जहां तक हमारी वैदेशिक नीति के सिद्धांतों का संबंध है, वहां तक इस सदन का कोई दल, इस सदन का कोई भी सदस्य, उन सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं है। कल मैंने बड़े ध्यान से अपने साम्यवादी दल के नेता का भाषण सुना, उन्होंने यह कहा कि मूल प्रश्न हमारी मूल नीति के समर्थन का है।
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